Trikal Sandhya – वैदिक उपासना त्रिकाल संध्या

धर्मज्ञान में आपका स्वागत है। आज हम भारतीय उपासना पद्धति त्रिकाल संध्या ( Trikal Sandhya) से सम्बंधित ज्ञान प्राप्त करेंगे। त्रिकाल संध्या क्या है ? त्रिकाल संध्या क्यों करनी चाहिए ? त्रिकाल संध्या के नियम और पद्धति क्या है ? त्रिकाल संध्या के मंत्र या श्लोक क्या है ? और त्रिकाल संध्या से क्या लाभ होते है ? ये सभी पहलु पर प्रकाश डालेंगे ।

 

Contents hide
1 भारतीय संस्कृति की उपासना पद्धति त्रिकाल संध्या क्या है ? What is Trikal Sandhya ?

भारतीय संस्कृति की उपासना पद्धति त्रिकाल संध्या क्या है ? What is Trikal Sandhya ?

त्रिकाल याने तीन समय, तीन काल। संध्या याने दो पहर को मिलने का समय। इसे हम दो काल का मिलने का समय भी कह सकते है। जिसे संधि काल भी कहते है।

  • सुबह सूर्योदय का समय – प्रातःकाल
  • सूर्य के दिन का मध्य का समय – मध्याहन
  • सूर्यास्त का समय – सायंकाल

ये तीनो समय संध्या के है। एक दिन के तीन समय जिसमे एक दूसरे पहर के साथ मिलन होता है, इसे त्रिकाल संध्या (Trikal Sandhya)  कहते है।

त्रिकाल संध्या वंदन याने दिन के तीन समय में की जाने वाली उपासना पद्धति है। भारत की वैदिक संस्कृति में इसका बहुत महत्व है। 

Trikal Sandhya

त्रिकाल संध्या का महत्व- Importance of Trikal sandhya 

हिन्दू सनातन धर्म में ज्ञान और उपासना पद्धति अद्भुत है। परमात्मा के समीप जाने के अनेक रास्ते है। उसमे से एक उत्तम रास्ता त्रिकाल संध्या है।

मनुष्य की मानशिक शारारिक और बिद्धिक विकास के लिए त्रिकाल संध्या श्रेष्ठ माना जाता है।

संध्या उपासना करने वाले मनुष्य की मन और बुद्धि प्रभु मय हो जाती है। नित्य और नियमित संध्या वंदन हमें परमात्मा के नजदीक ले जाते है।

त्रिकाल संध्या वंदन में किये गए प्राणायाम हमारे शरीर को मजबूत करता है। शरीर निरोगी एवं स्वस्थ रहता है।

संध्या वंदन से दिन के तीनो पाहोर में अज्ञानता वश किये गए पाप कर्मो का नाश होता है।

प्राचीन काल में ऋषिमुनिओ द्रारा प्राप्त उपासना पद्धति में संध्या उपासना का विशेष महत्व है। सनातन धर्म के आधार स्तंभ माने जाने वाले वेदो में भी इसका विशेष महत्व बताया गया है।

भगवान श्री राम, भगवान श्री कृष्ण, विश्वामित्र, वशिष्ठ एवं अगस्त जैसे महान ऋषि भी संध्या उपासना करते थे।

 

गायत्री परिवार द्वारा त्रिकाल संध्या

गायत्री परिवार एक वैश्विक संस्था है। वेदमाता गायत्री की विशेष रूप से पूजन अर्चन करते है। विश्व को एक धार्मिक और आध्यात्मिक विचार से एक परिवार बनाने की उनकी कोशिश सराहनीय है।

माता गायत्री माता को वेदो की माता कहा जाता है। संध्या वंदन का वर्णन वेदो में भी शामिल है। इसीलिए, गायत्री परिवार में त्रिकाल संध्या का विशेष महत्व है। और गायत्री परिवार का संध्या वंदन सबसे आसान भी माना जाता है। इसे ब्रह्मसंध्या भी कहा जाता है।

गायत्री परिवार द्वारा संध्या उपासना में गायत्री मंत्र का जाप किया जाता है। गायत्री मंत्र सनातन संस्कृति के श्रेष्ठ मंत्रो में से एक है।

संध्या वंदन से पहले तन मन से पवित्र होना जरुरी है। संध्या उपासना में गायत्री मंत्र का 108 या 1008 बार जाप किया जाता है।

 

त्रिकाल संध्या का समय क्या है ? Trikal Sandhya Timing

 

प्रातःवंदना

रात का अंधेरा और सुबह का उजाला ये दोनों के मिलने का समय जिसे हम प्रातःकाल कहते है। इसे सूर्योदय का समय भी कहते है। सुबह की संध्या वंदन का यह समय उत्तम होता है।

इसमें हम समय की बात करे तो सूर्योदय से कुछ समय पहले और सूर्योदय के कुछ समय बाद का टाइम सुबह की संध्या की जाती है। ( सूर्योदय से 10 से 20 मिनट आगे बाद का समय श्रेष्ठ है। )

दुपहर की वंदना

मध्याहन याने मध्य का समय, दिन के बिच का समय जब सूयदेवता दिन के मध्य में होता है। इस समय को मध्याहन कहते है।

इसे समय के हिसाब से देखे तो उस वक्त दिन के 12 बजे का समय होता है। इसे लिए दुपहर की संध्या वंदन करने के लिए 12 बजे के आसपास का समय होता है।

सायंकाल की वंदना

सूर्य के अस्त होने का समय को सायंकाल कहा जाता है। इसे संध्या काल भी कहा जाता है।
सूर्यास्त से कुछ समय पहले और सूर्यास्त के कुछ समय बाद का समय संध्याकाल का होता है। ( सूर्यास्त से 10 – 20 मिनट पहले और बाद का समय ) साम की संध्या वंदन के लिए यह समय को उचित माना जाता है।

 

त्रिकाल संध्या भारतीय वैदिक संस्कृति की प्राचीन परम्परा है। प्राचीन काल में हमारे ऋषिमुनि गुरुकुल में  शिष्य को त्रिकाल संध्या वंदन शिखाते थे। समय के साथ ये नष्ट हो रहा है। फिरभी कही धार्मिक संस्था ने इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया है। जो इस उपासना पद्धति के लिए प्राण सामान है।

 

त्रिकाल संध्या में हमें क्या करना चाहिए ?

हिन्दू सनातन धर्म में संध्या वंदन की अनेक विधिया प्रचलित है। धार्मिक संस्थाए अपने आराध्य देव की प्राथना करके संध्या वंदन करते है। जैसे गायत्री परिवार माता गायत्री का मंत्र से संध्या उपासना करते है।

स्वाध्याय परिवार पुंजय पांडुरंग आठवले द्वारा दिए गए त्रिकाल संध्या ( Trikal Sandhya) का पठन करते है।

संध्या उपासना का तरीका थोड़ा अलग हो सकता है। पर लक्ष्य सबका एक ही होता है। रास्ता अलग हो सकता है पर मंजिल सबकी एक ही है।

  • हिन्दू धर्म में मानने वाला मनुष्य अपने आराध्य देवी देवता का पूजन कर सकता है।
  • मंत्र जाप और प्राथना कर सकता है।
  • अपने आराध्य देवी देवता का स्मरण कर सकता है।
  • मनुष्य ध्यान और प्राणायाम से भी संध्या वंदन कर सकते है।

 

स्वाध्याय परिवार में त्रिकाल संध्या का महत्व

स्वाध्याय परिवार के प्रणेता पुंजय पांडुरंग शास्त्री जी ने त्रिकाल संध्या का महत्व समझाया है। वैदिक विचरधारा से जुड़ा स्वाध्याय परिवार बहुत सारे लोग नियमित रूप से इसका पालन करते है

पूज्य पांडुरंग शास्त्री के विचार के अनुरूप त्रिकाल संध्या एक एटम बम की तरह है। त्रिकाल संध्या ( Trikal Sandhya) में अद्भुत शक्ति का मिलन है। इसे यदि बारह साल तक निरंतर किया जाये तो एक तपस्या बन जाता है। और मनुष्य जीवन में यह बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है।

भगवान हमारा जीवन चलाता है। हमारे दैनिक जीवन की क्रियाए जिस पर मनुष्य का कण्ट्रोल नहीं होता है।
जैसे सोये हुए इंसान को सुबह में जगाना। हमारे भोजन का पाचन कर लाल रंग का लहू बनाना। रात को कैसे नींद मिलती है जिसे हम दुनिया से दूर हो जाते है। ये सभी क्रिया में से एक क्रिया छूट जाये तो, राम नाम सत्य है।

बिना रुके बिना थके भगवान के ये उपकार हम पर सतत हो रहे है। हमें स्मृति, शक्ति और शांति प्रदान करते है।

स्मृतिदान – सुबह में नींद से उठते ही हमें पता चलता है की, में कौन हु ? में किसका हु ? जो हमें नींद में मालूम नहीं था।

शक्तिदान – हम जो भी खाना खाते है, उसका पाचन कोई शक्ति ही करती है। तभी तो दुनिया में सभी लोगो का लहू एक रंग का होता है। इस खाने को पचाना और इसमें से हमें शक्ति प्रदान करने का काम भी भगवान का है।

शान्तिदान – पुरे दिन के काम काज के बाद मनुष्य को थकान महशूश होती है। हमारे शरीर को आराम और शांति की जरुरत होती है। ऐसे में भगवान ने दी हुई मीठी निद्रा हमें शांति प्रदान करती है।

 

Trikal Sandhya

 

त्रिकाल संध्या के श्लोक- Trikal Sandhya Shlok Swadhyay Parivar 

पुंज्य पांडुरंग शास्त्री ने बहुत ही वैचारिक ढब से त्रिकाल संध्या लोगो को दी है।
पहले भगवान के अनेक उपकार हमें बताये गए। उस उपकार के बदले में हम क्या कर सकते है ? यह समझाया गया।

त्रिकाल संध्या से भगवान के प्रति हम अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर सकते। हम पे जो निरंतर उपकार कर रहा है, उसे थैंक यू कह सकते है, उसे शुक्रिया कह सकते है।

त्रिकाल संध्या ( Trikal Sandhya) की प्रार्थना के रूप में तीन समय का श्लोक दिया गया। जिसमे भोजन समय, सुबह में उठते समय और रात तो सोते समय का श्लोक है। इस श्लोक के श्रवण और पठन से हमारा त्रिकाल संध्या का वंदन होता है।

त्रिकाल संध्या के सुबह के श्लोक – स्मृतिदान

1 – कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमूले सरस्वती।
करमध्ये तू गोविन्दः प्रभाते कर दर्शनम ।।

अर्थ-: हमारे हाथ की अंगलियों पर माता लक्ष्मी का निवास है। हाथ के मूल स्थान पर माता सरस्वती रहती है। और हाथ के मध्यभाग में गोविंद का वास है। इसीलिए रोज सुबह हमें हाथ के दर्शन करना चाहिए।

2 – समुद्रवसने देवी पर्वतस्तनमंडले।
विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पदस्पर्श क्षमस्व में।।

अर्थ-: इस श्लोक में धरती माता को विष्णु की पत्नी बताया गया है। और एक मनुष्य के रूप में हमारा भार सहन करने वाली धरती माता से हम क्षमा याचना करते है।

3 – वसुदेवसुतं देवं कंसचारुनमद्रनम।
देवकीपरमानन्दनम कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम।।

अर्थ-:वासुदेव का पुत्र कंस एवं चारुन जैसे राक्षशो का नाश करने वाले। माता देवकी के लाल भगवान श्री कृष्ण ही इस जगत के गुरु है। उन्हें कोटि कोटि वंदन।

 

भोजन समय के त्रिकाल संध्या के श्लोक – शक्तिदान

1 – यग्नशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वे किल्विषै:
भुञ्जते ते त्वघ पापा ये प्राचत्यात्मकारणात।

अर्थ-:भोजन यज्ञ में देवो को समर्पण करके, बाकि बचा हुआ आहार ग्रहण करने वाला सज्जन सभी पापो से मुक्त होता है। जो केवल अपने स्वार्थ के लिए ही अन्न पकाता है, वह पाप का अन्न भक्षण करता है।

2 – यत्करोषि यदश्नासि यज्जहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥

अर्थ-: है कौन्तेय तू जो कर्म करेगा, जो भी सेवन करेगा, जो भी हवन करेगा, जो तप करेगा वो सब मुझे या ने परमेश्वर को अर्पण कर।

3 – अर्ह वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥

अर्थ-:सभी प्रकार के प्राणिओ के शरीर में रहने वाला में, में ही वैश्वानर अग्निरूप प्राण और आपन से होकर खाद्य, पेय, चोष्य और अन्न का पाचन करता हु।

4 – ॐ सह नाववतु सह नौ भनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावघीतमस्तु मा विहिषावहै।।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।

अर्थ-:है ईश्वर हम दोनों गुरु तथा शिष्य का रक्षण करे, हम दोनों का समान पोषण हो। हम दोनों में परस्पर द्वेष ना हो। हम ऊर्जावान रहे, हमारी विद्या तेजस्वी रहे। हमारे सभी संताप दूर हो।

 

सयन समय के त्रिकाल संध्या के श्लोक – शांति दान

1 – कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥

अर्थ-: वासुदेव का पुत्र भगवान श्री कृष्ण, सभी दुःखो के नाश करने वाले परमात्मा, शरण में आये लोगो का दुःख़ दूर करने वाले गोविन्द को मेरा प्रणाम।

2 – करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वाअपराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शंभो॥

अर्थ-: हाथ पेर वाणी शरीर कर्म, कान, नाक और आंख इनसे अनजाने में मेने गलती की होगी। इसके लिए है करुणा के सागर मुझे क्षमा करे। आपका जय जय कार हो।

3 -त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥

अर्थ-: तू ही मेरी माता और तू ही मेरे पिता है। तू ही मेरा भाई तू ही मेरा सखा है। तू ही धन है और तू ही विद्या है। तू ही मेरा सबकुछ है।

 

प्राचीन काल में त्रिकाल संध्या का महत्व

त्रिकाल संध्या (Trikal Sandhya)  उपासना पद्धति का उत्तम रास्ता था। जिसे हमारे ऋषिमुनि खुद भी करते थे। और मनुष्य के दैनिक जीवन का हिस्सा बने यह भी कोशिश करते थे।

प्राचीन काल में बच्चो की शिक्षा के लिए गुरुकुल होते थे। गुरुकुल में गुरूजी अपने शिष्यों को त्रिकाल संध्या (Trikal Sandhya) करवाते थे। मनुष्य जीवन में त्रिकाल संध्या का महत्व समजाते थे।

समय की गति के साथ सब बदल गया। वैदिक संस्कृति के मूळ सामान त्रिकाल संध्या नष्ट होने लगी है। बहुत सारे सनातनी होंगे जिसको त्रिकाल संध्या के बारेमे कुछ नहीं मालूम होगा।

फिर भी गायत्री परिवार और स्वाध्याय परिवार जैसे धार्मिक संस्थाओ ने इसे जिवंत रखने की अच्छी कोशिश की है।

 

त्रिकाल संध्या (Trikal Sandhya)  करने के लिए उत्तम स्थान

संध्या वंदना हमारे घरके पूजा कक्ष और मंदिर के सामने की जाती है। गोशाला और किसी नदी के तट पर संध्या उपासना की जाती है। हमारे आराध्य देव की प्रतिमा के सामने संध्या वंदन किया जाता है।

शाश्त्रो के अनुशार अलग – अलग जगह की जाने वाली संध्या उपासना से अलग अलग प्रकार के फल की प्राप्ति होती है।

अपने घर से ज्यादा गोशाला में, गोशाला से ज्यादा नदी के तट पर और नदी तट से ज्यादा भगवान प्रतिमा के सामने वंदना करने से ज्यादा फल की प्राप्ति होती है।

 

संध्या पूजन में आवश्यक वस्तुए
  • जल से भरा हुआ ताम्बा का पात्र
  • पुष्प या फूल की माला
  • चन्दन
  • आचमनी
  • घंटी
  • तुलसी अथवा रुद्राक्ष की माला
  • बैठने के लिए आसान

 

त्रिकाल संध्या पूजन की विधि 

1- सबसे पहले तन मन से पवित्र होकर ऊपर बताये गए सारे सामान के साथ आसान पे बेथ जाईये।

2- अपने आराध्य देव का नाम लेकर तीन बार जल को आचमन करे ।

3- मन ही मन अपने आराध्य देव को यद् करके, संध्या वंदन कर रहा हु का संकल्प करे ।

4- संध्या वंदन में आप स्तुति, मंत्र, आरती, प्राथना, स्त्रोत्र, श्लोक कुछ भी बोल सकते है ।

5- गायत्री की संध्या वंदन में माता गायत्री का मंत्र का जप होता है। यह 108 या 1008 बार किया जाता है ।

6-  इसमें अपने इस्ट्देव या गुरुमंत्र भी बोल सकते है।

7- संध्या वंदन के बाद पानी को सूर्यभगवान को अर्पित किया जाता है।

इस प्रकार संध्या उपासना कर सकते है। इससे ज्यादा विस्तृत में हमारे धर्म ग्रंथो में बताया गया है।

 

त्रिकाल संध्या से लाभ – फायदा – Benifit of Trikal sandhya 

 

1- मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति का होता है। नित्य त्रिकाल संध्या (Trikal Sandhya) हमें अपने लक्ष्य की और ले जाती है।

2- दिन के तीनो समय में हम भगवान के समीप होते है। यहाँ अपनापन लगता है। श्रद्धा और भक्ति बढ़ोतरी होती है।

3- हमारा मन शुद्ध होता है, मन मे पवित्र भावनाएं जन्म लेती है। सच्चे और उत्तम विचार हमें दुर्गुण मुक्त करते है।

4- मनुष्य के लिए दुश्मन की सामान काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे दुर्गुण दूर होते है। और सत्वगुण का स्थापन होता है।

5-  नियमितता पूर्वक त्रिकाल संध्या ( Trikal Sandhya) करने से मन एक चित होता है। मन की चंचलता दूर होती है। और एकाग्रता बढ़ती है।

6- मन की मजबुतायी बढ़ती है, जिसे हमारी संकल्प शक्ति दृढ होती है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है ।

7- मनुष्य द्वारा निरंतर प्रभु भक्ति में विलीन होकर की जाने वाले संध्या उपासना से भगवान प्रसन्न होते है। और सम्पूर्ण जीवन निर्वाह का बोज अपने सर लेते है ।

8-  अनजाने और अज्ञानता से की ये गए पाप कर्म संध्या वंदन से नष्ट हो जाते है। मनुष्य निष्पाप होकर जीवन व्यतीत कर सकता है।

9- योग और प्राणायाम संध्या उपासना का एक भाग है। इससे तन और मन हमेशा निरोगी और स्वस्थ रहते है ।

10- त्रिकाल संध्या(Trikal Sandhya)  वंदन से मनुष्य जीजान का सर्वांगी विकास होता है और उन्नति होती है। 

11- निरंतर और नित्य त्रियकल संध्या वंदन को तपस्या माना जाता है। इसीलिए जो तपस्या से सिद्ध होता है, वह संध्या वंदन से सिद्ध होता है।

 गायत्री उपासना  – गायत्री मंत्र का अर्थ एवं लाभ

 स्तंभेश्वर महादेव रोज पानी में गायब होने वाला अद्भुत शिवलिंग   

सर्वे दुखो का एक इलाज – श्री हनुमान चालीसा

त्रिकाल संध्या (Trikal Sandhya) भारतीय संस्कृति की उपासना की श्रेष्ठ पद्धति में से एक है। यदि हम निरंतर इसे करते है, तो ये बहुत लाभ दायक होता है।

Sharing Is Caring:

4 thoughts on “Trikal Sandhya – वैदिक उपासना त्रिकाल संध्या”

Leave a Comment